आखिर क्यों नहीं की थी श्रीकृष्ण ने अपनी माँ की इच्छा पूरी, जानें

Vivek Sharma
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कभी माखन चुराया तो कभी मटकी फोड़ी।

कान्हा जी अपने सभी भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं और उन्हें हर प्रकार की मुश्किलों से बचाते हैं। मानव कल्याण के लिए भाद्रपद मास की अष्टमी तिथि के दिन देवकी के गर्भ से कृष्ण जी ने जन्म लिया। बाद में यमुना पार कर मथुरा से गोकुल माता यशोदा के पास आ गए। गोकुल में एक तरफ कृष्ण ने कई राक्षसों का अंत किया तो दूसरी तरफ मनोहर लीलाएं रचीं। कभी माखन चुराया तो कभी मटकी फोड़ी। माता यशोदा ने कृष्ण का लालन-पालन किया था श्रीमद् भागवत के अनुसार मुक्तिदाता भगवान से जो कृपा प्रशाद नंनदारी यशोदा को मिला, वैसा न ब्रह्मा, शंकर और उनकी पत्नी लक्ष्मीजी को भी प्राप्त नहीं हुआ। लेकिन फिर भी माता यशोदा की एक इच्छा ऐसी थी, जो कान्हा जी ने उनके अगले जन्म में पूरी की। आइए जानते हैं माता यशोदा उस इच्छा के बारें में….

भागवत गीता में माना गया है की जब कान्हा कुरुक्षेत्र की ओर जा रहे थे उसी समय वह माता यशोदा और नंदबाबा से मिले थे। भगवान कृष्ण को देखकर दोनो रोने लगे और ऐसा लगा मानो जैसे की उनके शरीर में दुबारा से जान आ गई हो। उस दिन सूर्यग्रहण था।

समांत पंचक वही तीर्थ स्थल था जहां हजारों क्षत्रीयों का वध करने के बाद परशुरामजी ने घोर तपस्या की थी और उसके बाद पश्चाताप किया था। कान्हा देवकी और वासुदेव के साथ थे और यही उनकी मुलाकात यशोदा और नंदबाबा से हुई थी। इस मुलाकात में देवकी और यशोदा गले लगकर बहुत रोईं और उन्होंने अपने सभी गम भुला दिए। इसके बाद एक बार और भगवान कृष्ण की यशोदा माता से मुलाकात हुई थी। इसके बाद में कान्हा माता यशोदा से मिलने तब पहुंचे, जब वह मृत्युशैय्या पर लेटी हुई थीं और अंतिम सांसों में कृष्ण का नाम लिए जा रही थीं। तब उन्होंने कृष्ण से कहा कि बेटा मुझे सिर्फ एक ही चीज का पछतावा है की मैं तुम्हारे किसी भी विवाह में शामिल नहीं हो पाई तब कृष्ण ने कहा था की माँ तुम्हारी यह इच्छा में अवश्य पूरी करुगा। इसके बाद कृष्ण ने माता यशोदा को गोलोक भेज दिया था।

पुरानी मान्यताओ के अनुसार, माता यशोदा का अगला जन्म माता वकुलादेवी के रूप में हुआ। श्रीकृष्ण ने पद्मावती के साथ विवाह किया था, जिसमें वकुलादेवी शामिल हुई थीं। एकबार श्रीकृष्ण को चोट लग गई तब वकुलादेवी एक मां की तरह उनकी देखभाल की थी। वकुलादेवी ने ही भगवान विष्णु का नाम श्रीनिवासन रखा था।

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