तुमको ढूंढ़ा गीतों में,ग़ज़लों और तरानों में , दिल बहलाने आते हो ,बस तुम मेरे ख्यालों में

Vivek Sharma

तुमको ढूंढ़ा गीतों में,ग़ज़लों और तरानों में ,दिल बहलाने आते हो ,बस तुम मेरे ख्यालों में ।यूं मिल जाते हो साजन ,तुम कभी कभी राहों में ,लब पर जो है बात रुकी ,वो सिमट जाती है आहों में ।ये प्यार भी कैसा होता है ,ना इनकार हो,ना इकरार ,हर बात […]

कुछ कुछ मेरी हालत तुम्हारे जैसी है

Vivek Sharma

कुछ कुछ मेरी हालत तुम्हारे जैसी है , पर सुनो ….. ये थोड़ी मेरे जैसी है , हज़ारों उलझने … उम्मीदों की कश्ती , महासागर में …….. कितने तूफ़ान , कितने भय ….. हर बार , छूटते छूटते बच जाती है , ज़िन्दगी की पतवार । ऊपर से नीचे , […]

सुबह की पहली किरण से, उस डूबती शाम तक

Vivek Sharma

सुबह की पहली किरण से,उस डूबती शाम तक……ना जाने कितने रंगभरती थी मैं , ज़िन्दगी के ….हर पल ,हर क्षण ,कुछ बाकी ना रहता ।सब भाव , भंगिमाएं ,चटक ,सजीले दिन ,जीवन के ,बीत गयी सदियां ,थक गई मैं …..पर रंग भरना ना छूटा,उन्हें सजाया ,सवांराकुछ बाकी ना रह जाए […]

जो नज़र आता है वो अपना नहीं

Vivek Sharma

जो नज़र आता है वो अपना नहीं, और जो अपना है वो नज़र आता नहीं। गुम हो गया हूँ कहीं “उजाले” में भाई, मुझसे मेरी पहचानकरा दे “राही” …..( एन. पी. सिंह )

यूँही नहीं चिराग़ मैंने, हवा में जला दिया..

Vivek Sharma

यूँही नहीं चिराग़ मैंने, हवा में जला दिया….मुद्दतों से लड़ा हूँ लड़ाई, दुष्वारियों से मैं….न कभी अश्क़ बहाएन कभी शिकायत की है….ये मेरी अपनी खता है जो हिमाकत की है….नफ़रतों के दरम्यां दिलको दिल से मिला दिया….यूँही नहीं चिराग़ मैंने, हवा में जला दिया…. ………….(एन. पी. सिंह )

क्यों पूछता है “राही”मैं पहले सा नहीं हूँ, शक्ल तो वही है बस”दिवंगत” हो गया हूँ

Vivek Sharma

क्यों पूछता है “राही”मैं पहले सा नहीं हूँ,शक्ल तो वही है बस”दिवंगत” हो गया हूँ,तू ढूँढता है जिसको वोह अब मैं नहीं हूँ,काया तो है पहले सीपर मैं कहीं नहीं हूँ,था कभी निगाहों मेंअब भी वहीं डटा हूँ,तब भी “खटकता” था अब भी खटक रहा हूँ,”रिश्तों” की बारात में कुछ […]

ये शायरी ओर किनके लिए… हक़ है तुम्हारा इनपे.. तुम्हारी है, नाज़ करो…

Vivek Sharma

अब दूरियाँ बना ही रहे हो तो बरक़रार भी रखना,हम क़रीब नहीं आएंगे हम पर एतबार भी रखना !! तमाम उम्र कटेगी यूँ ही…वो सामने ना होगी.. फिर भी दिखेगी… ये शायरी ओर किनके लिए…हक़ है तुम्हारा इनपे.. तुम्हारी है, नाज़ करो…

मैंने कोरोना का रोना देखा है! और उम्मीदों का खोना देखा है!!

Vivek Sharma

मैंने कोरोना का रोना देखा है!और उम्मीदों का खोना देखा है!! लाचार मजदूरों को रोते देखा है!गिरते पड़ते चलते और सोते देखा है! पिता को सूनी आंखों से तड़पते देखा है!!तो मां की गोद में बच्चे को मरते देखा है! गरीबों का खुलेआम रोष देखा है!!तो मध्यमवर्ग का मौन आक्रोश […]

मैं तेरे इश्क की औकात दैखना चाहता हूं , और इसलिए

Vivek Sharma

मैं तेरे इश्क की औकात दैखना चाहता हूं , और इसलिए …….. क्या मसरूफियत में मेरा ख़्याल आता है तुझे … या उठाता है ,जब दुआओं में , तू हाथ .. … तो क्या नाम मेरा भी , याद आता है तुझे ………. बेअदब , बेसबब सी , जब मैं […]

Subscribe US Now