सुबह की पहली किरण से, उस डूबती शाम तक

Vivek Sharma
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सुबह की पहली किरण से,
उस डूबती शाम तक……
ना जाने कितने रंग
भरती थी मैं , ज़िन्दगी के ….
हर पल ,हर क्षण ,
कुछ बाकी ना रहता ।
सब भाव , भंगिमाएं ,
चटक ,सजीले दिन ,जीवन के ,
बीत गयी सदियां ,
थक गई मैं …..
पर रंग भरना ना छूटा,
उन्हें सजाया ,सवांरा
कुछ बाकी ना रह जाए ,
हर पल बस यही हिसाब लगाया
उस पहली किरण से ,
उस आखिरी डूबती किरण तक।
मेरे सारे कैनवास, ज़िन्दगी के
उस दिन बेरंग हो गये ,
जब तुमने उन्हें,
रात स्याह में देखा ….
जो वर्षों से रंगा था ,
उस अंधेरे में तुम देख ना सके।
हम दो अलग-अलग
कलाकार थे ,
उसी जीवन के कैनवास के…
जिनमें मैं रंग भरती गई ,
और तुम स्याह करते गये …….

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