मैं तेरे इश्क की औकात दैखना चाहता हूं , और इसलिए

Vivek Sharma
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मैं तेरे इश्क की औकात दैखना चाहता हूं ,
और इसलिए …….. क्या मसरूफियत में मेरा ख़्याल आता है तुझे …
या उठाता है ,जब दुआओं में , तू हाथ .. … तो क्या नाम मेरा भी ,
याद आता है तुझे ………. बेअदब , बेसबब सी ,
जब मैं हूं तन्हा , तो हाथ पकड़ के , क्या घर ले जाता है मुझे …….. मैं ,
जो भी हूं , जैसI भी हूं , जिस हाल में हूं , क्या ऐसे का ऐसा ,
बता , अपनाता है मुझे ……. मैं , तेरे इश्क़ की ,
औकात देखना चाहता हूं ……. किस औकात पे लाकर ,
ये इश्क ,तू दिखाता है मुझे ।

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