यादों की तितली ,रंग बिरंगी,पकड़ी तो बेरंग हो गई । बहुत चाहा जिसे, सम्भाला भी बहुत ,वही चीज़ अक्सर खो गई।

Vivek Sharma
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यादों की तितली ,रंग बिरंगी,पकड़ी तो बेरंग हो गई ।
बहुत चाहा जिसे, सम्भाला भी बहुत ,वही चीज़ अक्सर खो गई।
ख्वाहिशों का धुआं करते रहे , इक तमन्ना कहीं बहुत रो गई ।
जगाते रहे रोज़ आरज़ू इक नई,और एक चाहत दिल में सो गई।
ज़िन्दगी पहुंच गई थी वहां ,मौत होते होते, जहां रह गई ।

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