कुछ कुछ मेरी हालत तुम्हारे जैसी है

Vivek Sharma
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कुछ कुछ मेरी हालत
तुम्हारे जैसी है ,
पर सुनो …..
ये थोड़ी मेरे जैसी है ,
हज़ारों उलझने …
उम्मीदों की कश्ती ,
महासागर में ……..
कितने तूफ़ान ,
कितने भय …..
हर बार , छूटते छूटते
बच जाती है ,
ज़िन्दगी की पतवार ।
ऊपर से नीचे ,
नीचे से ऊपर ,
हिलोरें लगाती , मेरी
बेबस जिंदगी ……
दूर से दिख रहीं ,
वो दो मासूम कलियां ,
मुझे समन्दर को ,
पार करने को कहती हैं ।
पता नहीं ……..
पर तुम इन्तज़ार करना ,
मेरी आखिरी सांस तक ,
शायद … …..
तुम तक पहुंच सकूं …..
मुरझाना नहीं
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