खिली सी रंगत पर , हजारों रंगीन अफ़साने लिखे । बेगैरत सादगी आ कर क्यों , मौसम बिगाड़ देती है ??

Vivek Sharma
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खिली सी रंगत पर , हजारों रंगीन अफ़साने लिखे ।
बेगैरत सादगी आ कर क्यों , मौसम बिगाड़ देती है ??

खिली हो धूप-छांह में , तमस में चांदनी का जलवा ।
खामोशी छेड़ती है राग , नीरव में गजल का मसला ।।

अनजान सी रागिनी आकर , तरन्नुम बिगाड़ देती है ।।
बेगैरत सादगी आ कर क्यों , मौसम बिगाड़ देती है ।।

धुली-धुली सी फ़ज़ा उल्फ़त , के हसीन नग्में गाती ।
हैं लव खामोश मगर निगाहों , से हरेक सदा आती ।।

तजुर्बा शोखियाँ में नहीं मगर , सनम बिगाड़ देती हैं ।।
बेगैरत सादगी आ कर क्यों , मौसम बिगाड़ देती7 है ।।

तुम्हें है माफ सब मुहब्बत करो , या कि कत्ल करो ।
कुबूल हम ने किया गवारा है , इश्क़ या जुल्म करो ।।

‘जय’ तुम पर मरमिटने की , कसम बिगाड़ देती है ।।
बेगैरत सादगी आ कर क्यों , मौसम बिगाड़ देती है ।।

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