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वो हवा थी,मेरे तन को छू करनिकल गई,
उसे क्या मालूममैंने, तो उसकीरूह को छुआ है।
बीते सालों मेंबस इतना सा समझ पाया हूँ “राही”,’
दुनिया’ जो समझती है ‘”गणित'” वो कभीअपनीसमझ में न आया।
मैंने, तो वो सब किया, जोअपने कोसमझ आया….
(एन .पी . सिंह )
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