*आओ लौट चलें* क्या तुमने कभीे किया है प्रेम को प्रेम ! शायद तुम्हें पता भी न होगा प्रेम क्या है

Vivek Sharma
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*आओ लौट चलें*
क्या तुमने कभीे किया है प्रेम को प्रेम ! शायद तुम्हें पता भी न होगा प्रेम क्या है,
प्रेम एहसास है जहाँ न खोना है न पाना वहाँ तो बस देते जाना है,
तुम हो कि तौलते रहते हो तराजू में प्रेम को व्यापारियों की तरह ,
कोई तुम्हें या तुम किसी को ठगने में लगे रहते हो ,
ढूँढते रहे उम्र भर तुम इसे अनगिनत चेहरों में ,
भटकते रहे बाँंस-वन में क्या बना पाए एक बाँसुरी भी,
जो बज उठती तुम्हारे होठों को छू कर एक बार ही सही झाँक कर,
देखोमन के दर्पण में क्यों देवदास बने रहते हो ,
सच तो ये है माया मिली न राम मैं कहती हूँ अभी भी नहीं हुई है देर
,आओ लौट चलें ! अपनी ओर।

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