उफ़ कितना बोझ है , तुम्हारे ऊपर आओ , तनिक बैठो न, रख दो ये गठरी,सिर से उतार कर

Vivek Sharma
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उफ़… कितना बोझ है ,
तुम्हारे ऊपर
आओ , तनिक बैठो न,
रख दो ये गठरी,सिर से उतार कर …….
कितने अस्त व्यस्त से लगते हो
माथे पर गहरी- गहरी रेखाऐं…
आंखों में गहरी उदासी ……
शरीर में शिथिलता…..
तुम कभी थकते तो न थे ,
सुख-दुख, लाभ-हानि
से परे थे तुम….

सही कहा मित्र , मैं समय हूं ….
और,यही मेरी व्यथा भी है ,
और विडम्बना भी ,
कि, चाह कर भी मैं ……
कभी रुक नहीं सकता ,
ना हंस सकता हूं ,ना रो सकता,
ना थम सकता हूं,ना सो सकता ,
बस देखता रहता हूं …….
निर्जीव सा……
असहाय ,बेबस , लाचार …
पर तुम तो इन्सान हो ,
फिर क्यों , रुक जाते हो ,
थक जाते हो ……..
तुम्हारा यह हार मान जाना ,
मुझे निर्जीव कर देता है
तुम्हारे लिए चलता रहता हूं
मैं, निरन्तर,आदि से अनंत
पर तुम बैठ जाते हो……..
और तुम्हारी गठरी, मेरे
सिर पर आती जाती है …
इसलिए उठो ! और चलो……
बस चलते चलो…….
कभी मक़सद तो कभी बेमक़सद……

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