ख़ामोशी तू मेरे साथ चल ,डर लगता है अब कहने में , सब कुछ तू कहती रहना ,डर लगता है अब सहने में ,

Vivek Sharma
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ख़ामोशी तू मेरे साथ चल ,डर लगता है अब कहने में ,
सब कुछ तू कहती रहना ,डर लगता है अब सहने में ,
तेरा सहारा , मज़बूत लगे ,महफ़िल कितनी अकेली है ,
लोगों की गिनती ना करना , बस इक तू ही सहेली है ।
तूने सुना , तूने देखा , तूने ही बस जाना है , लफ़्ज़ों ने कहा क्या,
और दिल का क्या अफसाना है ।मज़बूर हुए या मगरुर हुए ,
जो भी हो,बस हम चूर हुए ,मैं पड़ी रहूंगी बस यहीं ,
अब,आते जाते लोगों से हाथ मिलाना है ।

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